ग्रामीण भारत में ताश के पत्तों का जाल: युवा पीढ़ी का भविष्य खतरे में ,जिनके हाथों में किताबें होनी चाहिए, वहां तास के पत्ते चमक रहे हैं
रिपोर्ट श्याम आर्य
ग्रामीण इलाकों के गांवों जैसे रंभा,पलस्या में एक चिंताजनक दृश्य आम हो चुका है—छोटे-छोटे बच्चे, जिनके हाथों में किताबें और कलम होनी चाहिए, वे ताश के 52 पत्तों के जाल में फंसते हुए दिखाई नजर आए हैं। शाम ढलते ही अनेक जगह पर,पेड़ों की छांव या घरों के आंगन में ताश का खेल जोरों पर दिखाई दे रहा है वही सट्टेबाजी का काम भी जोरों पर है यह खेल न केवल समय बर्बाद कर रहा है, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य को भी दांव पर लगा रहा है। यह बेहद शर्मनाक स्थिति है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास को प्रभावित कर रही है।समस्या की गहराई: गांवों में व्यसन का फैलाव बैतूल जिले के अनेकों जगह जैसे रंभा पलस्या सहित ग्रामीण इलाकों में ताश का खेल महामारी की तरह फैल चुका है। 12,15 साल के बच्चे भी इसमें शामिल हो जाते हैं। एक हालिया सर्वे के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में 30-40 प्रतिशत युवा रोजाना 3-4 घंटे ताश खेलने में बिताते हैं। सट्टेबाजी की वजह से छोटी रकम से शुरू होकर हजारों रुपये का दांव लगने लगता है। यह खेल खुलेआम खेला जाता है, जहां, पुलिस की लापरवाही और सामाजिक स्वीकृति ने इसे और बढ़ावा दिया है।
माता-पिता की अनदेखी: बच्चे ताश के जाल में फंस रहे, मां-बाप को भनक भी नहीं
ग्रामीण भारत में ताश के पत्तों का व्यसन फैलाने में माता-पिता की अज्ञानता बड़ी भूमिका निभा रही है। कई मां-बाप को पता ही नहीं कि उनका बच्चा स्कूल से लौटकर चाय की दुकान पर सट्टा लगा रहा है। वे खुद थकान के बाद ताश खेलते हैं, लेकिन बच्चों की नकल को नजर अंदाज कर देते हैं। यह लापरवाही न केवल परिवार को बर्बाद कर रही है, बल्कि पूरे गांव के भविष्य को खतरे में डाल रही है।
ग्रामीण परिवारों में माता-पिता दिनभर खेतों, मजदूरी या घरेलू कामों में व्यस्त रहते हैं। शाम को थकान के कारण वे बच्चों पर नजर नहीं रख पाते।
अधिकतर माता पिता खुद पढ़े-लिखे न होने से माता-पिता को खतरे की गंभीरता समझ नहीं आती। वे सोचते हैं, “बच्चा पड़ रहा है, या क्या बिगड़ेगा?”
माता-पिता की जिम्मेदारी: अब जागने का समय माता-पिता ही बच्चे के पहले गुरु होते हैं। उनकी जिम्मेदारी है कि ताश जैसे व्यसनों से बचाएं। रोजाना निगरानी: शाम को बच्चे के दोस्तों, कपड़ों और जेब से पैसे की जांच करें। आस पास पर जाकर देखें।यदि माता-पिता जागरूक हो जाएं, तो 80 प्रतिशत बच्चे इस जाल से बच सकते हैं। याद रखें, आज का लापरवाह बच्चा कल का बोझ बनेगा।
निष्कर्ष: जिम्मेदारी निभाएं, भविष्य बचाएं ताश के पत्ते किताबों की जगह न लें, इसके लिए माता-पिता को सतर्क रहना होगा। अनजान रहना अब बहाना नहीं चलेगा। गांव-गांव में जागरूकता सभाएं हों, जहां माता-पिता शपथ लें कि वे बच्चों को व्यसनों से दूर रखेंगे। समय आ गया है—हाथों में पत्ते नहीं, कलम थामें!







