पोपटी में धूमधाम से लगा प्रसिद्ध मेघनाथ मेला, आदिवासी परंपराओं की दिखी झलक
भीमपुर — भीमपुर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले पोपटी गांव में मंगलवार को प्रसिद्ध मेघनाद मेला जोर-शोर से आयोजित हुआ। यह ऐतिहासिक मेला बैतूल जिले के भीमपुर ब्लॉक की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है, जहां आदिवासी समुदाय की जीवंत परंपराएं लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। आस पास के सैकड़ो गांव के ग्रामीण क्षेत्रों लोग आए इसके अलावा महाराष्ट्र के जैसे इलाकों से दर्शक उमड़ पड़े।
मेघनाथ पूजन और मन्नतों का अनोखा संगम
मेले का मुख्य आकर्षण मेघनाथ की पूजा-अर्चना रही। भक्तों ने यहां अपनी मन्नतें मांगीं और पूरी होने पर शानदार पूजन किया। स्थानीय आदिवासी भाईचारा, खासकर आदिवासी समाज जनजातियां, अपनी प्राचीन रीतियों के अनुसार पूजा में शामिल हुए। मेघनाथ को वीर योद्धा मानते हुए वे पारंपरिक विधियों से उनकी आराधना करते हैं, ।
आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक
: पोपटी मेले में वेशभूषा, नृत्य और बाजे मेले में आदिवासी परंपराओं की अनोखी छटा देखने को मिली। पुरुष रंग-बिरंगे कपड़े चांदी के गहने, मोतियों की माला और सिर पर रंगबिरंगी पगड़ी सजाए नजर आऐं। पुरुष पारंपरिक धोती-कुर्ता पहने, कमर में पिला , लाल गमछे बांधे हुए थे। सबसे रोमांचक रहा ‘डोल’ नामक विशाल ढोल का बाजा, जो 4-5 फीट ऊंचा होता है। दर्जनों युवा इसे कंधों पर उठाकर थिरकते हुए नृत्य करते हैं। इसकी धुन इतनी अनोखी है कि यह केवल मेघनाद मेले में ही गूंजती है—गहरी, लयबद्ध थाप जो दिल की गहराई तक उतर जाती है।नृत्य में सभी एकजुट होकर एक साथ सुंदर वेशभूषा के साथ नृत्य प्रमुख रहा
परंपराएं प्रकृति पूजा, फसल उत्सव और वीरता गाथाओं से प्रेरित हैं। आसपास के सैकड़ों गांवों से लोग अपनी पूर्ण पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे, जिससे मेला एक जीवंत सांस्कृतिक महोत्सव बन गया। बच्चे भी छोटे-छोटे डोल बजाते हुए भाग लेते नजर आए, परंपरा को जीवित रखते हुए।व्यापार और मेले की रौनकमेले में सैकड़ों स्टॉल सजे, जहां खेल खिलौने,अंगूर, संतरे, चश्मा जैसे कीमती सामग्री लोग खरीदते हुए दिखाई पड़ी। महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश के व्यापारियों ने कपड़े, बर्तन, सौंदर्य प्रसाधन और खिलौने बेचे। देर शाम तक चलने वाले मेले ने समां बांध दिया।
सड़कों पर लगा मेला ,ट्रैफिक व्यवस्था पर सवाल
हालांकि, किसानों की फसल न कटने से मेला मुख्य सड़क किनारे लगा, जिससे वाहनों को घंटों इंतजार करना पड़ा। राहगीरों व ड्राइवरों को भारी परेशानी हुई। पुलिस प्रशासन की पर्याप्त मौजूदगी न दिखी, जिससे ट्रैफिक व्यवस्था बाधित रही। स्थानीय लोगों ने कहा पुलिस का मेले जैसे में बेहतर प्रबंधन होना चाहिए यह मेला आदिवासी जीवनशैली को संरक्षित रखने का माध्यम है, जो आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़ाव दिखाता है।






